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महात्मा गांधी नरेगा ने बदली बुलबुलराम की जिंदगी

छोटे किसान से सफल ऑर्गेनिक बाड़ी उत्पादक बने पाढ़ी गांव के बुलबुलराम

महात्मा गांधी नरेगा ने बदली बुलबुलराम की जिंदगी

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छोटे किसान से सफल ऑर्गेनिक बाड़ी उत्पादक बने पाढ़ी गांव के बुलबुलराम

कबीरधाम।

पंडरिया विकासखंड के ग्राम पाढ़ी के किसान श्री बुलबुलराम की कहानी यह साबित करती है कि मनरेगा केवल मजदूरी देने वाली योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन में बड़ा परिवर्तन लाने वाली जनकल्याणकारी योजना है। पशुशेड निर्माण की मंजूरी ने बुलबुलराम को आत्मनिर्भरता, बढ़ी आय और ऑर्गेनिक खेती की दिशा में नई राह दी।

₹68,000 से बना पशुशेड — मिला सुरक्षित स्थान, बढ़ी उत्पादकता

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खुले में पशु रखने की मजबूरी से जूझ रहे बुलबुलराम को मनरेगा योजना अंतर्गत ₹68,000 की स्वीकृति से पक्का पशुशेड मिला। इससे उनके गौवंशीय पशुओं को सुरक्षित स्थान मिला और दुग्ध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई।

दूध उत्पादन बढ़ा, आय में रोज़ 80–100 रुपए की बढ़ोतरी

बेहतर देखभाल और स्वच्छ वातावरण से प्रतिदिन 3–4 लीटर दूध उत्पादन होने लगा। ग्रामीणों द्वारा घर से ही दूध खरीदे जाने पर परिवार की कमाई प्रतिदिन 80–100 रुपए तक बढ़ गई।

गौवंशीय संख्या बढ़ी, पशु विक्रय बना नया आय स्रोत

सुरक्षित पशुशेड के बाद बुलबुलराम ने पशुओं की संख्या बढ़ाई। बछड़े–बछिया बढ़ने से उनका विक्रय संभव हुआ और परिवार को नई आमदनी का स्रोत मिला।

ऑर्गेनिक बाड़ी का कमाल — तीसरा आय स्रोत

पशुशेड में गोबर और गौमूत्र का व्यवस्थित संग्रह हुआ, जिसका उपयोग बुलबुलराम ने जैविक बाड़ी (रसोई उद्यान) में किया। बिना रासायनिक खाद के उगाई गई सब्जियों की गाँव में बढ़ी मांग ने आय में और इजाफा किया।
साथ ही, घर में सब्जी उत्पादन से बाजार पर निर्भरता खत्म होने से अच्छी बचत भी हुई।

सामुदायिक भावना — एक पशु का दान भी किया

अपनी बढ़ती सफलता के बीच बुलबुलराम ने सामाजिक सहयोग की मिसाल पेश करते हुए एक गौवंशीय पशु का दान भी किया।

मनरेगा — ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार

बुलबुलराम का परिवार इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि मनरेगा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संपत्ति निर्माण, आय वृद्धि, पर्यावरण संरक्षण और आजीविका सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम है।
एक पशुशेड ने उन्हें दूध विक्रय, पशु विक्रय, ऑर्गेनिक सब्जी उत्पादन और गौवंशीय वृद्धि के चार स्थायी आय स्रोत प्रदान किए।

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